सोनपुर मेला बिहार, ये जिन्दगी के मेले.........!—Hindi***हमारी संस्कृति हमारी विरासत।
सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हैं। मेले को 'हरिहर क्षेत्र मेला' के नाम से भी जाना जाता है जबकि स्थानीय लोग इसे छत्तर मेला पुकारते हैं। विश्वप्रसिद्ध हरिहरक्षेत्र मेले को कौन नहीं जानता? अन्य क्षेत्रों में भले ही हमारे राज्य संसार में सर्वप्रथम होने का गौरव न मिला हो, किंतु हमारे यहाँ संसार का सबसे बड़ा मेला लगता है, इसका गौरव तो हमें प्राप्त है ही!
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2022 Sonepur Mela will begin on: Sunday, 20 November
and ends on: Monday, 5 December
यह मेला उत्तर-पूर्व रेलवे के सोनपुर स्टेशन से-जो अपने प्लेटफॉर्म के लिए विश्वविख्यात है- पूरब लगता है। सगरपुत्रों का उद्धार करनेवाली गंगा, गज-ग्राह की कथा सुनानेवाली गंडकी तथा देवी सरस्वती के क्रीड़ास्थल शोणभद्र के संगमस्थल पर बसा यह परमपावन तीर्थस्थल है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन संगमस्नान कर हरिहरनाथ के मंदिर में जल चढ़ाने के लिए अपार भीड उमड़ती है। किंतु यहाँ लाखों लोग केवल जल चढ़ाने नहीं आते, वरन मेले का आनंद लूटने आते हैं।
हरिहरक्षेत्र का मेला बहुत बड़ा पशु-मेला है। कुछ वर्ष पहले गाय, बैल, घोड़े और हाथी इसके प्रमुख आकर्षण थे। किंतु जब से जमींदारी गयी, शहरी सभ्यता में द्रुतगामिनी मोटरगाड़ी आयी, हाथी के प्रति उदासी छा गयी। इस त्वरा के युग में मंदगामी और व्ययसाध्य गजराज उपेक्षित हो गये। जानवरों में छोटे-छोटे जानवर भी आते हैं; जैसे-बकरियाँ, कुत्ते आदि।
मेले के समय करीब तीन मील घेरे की सुनसान भूमि गुलजार हो उठती है। जहाँ शायद एक-दो दीये टिमटिमाते हों, वहाँ बिजली की चाँदनी छिटक उठती है। जहाँ खोजने-ढूँढ़ने पर कभी एक-दो भूले-भटके बटोही मिल पाते हों, वहाँ आदमियों की बाढ़ आ जाती है। जहाँ पेड़ों के झुरमुटों में कहीं-कहीं चिड़ियों की टी-टी-टुट-टुट सुनाई पड़ती हो, वहाँ लाउडस्पीकरों की अट्टध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। लगता है कि देहाती वेश में कोलकाते की चौरंगी या मुंबई की चौपाटी आ गयी हो।
कहीं मिठाइयों की सजी-धजी दूकानें हैं, तो कहीं कपड़ों की। फैशन की रंग-बिरंगी चीजे दर्शकों के झुंडों को अपनी ओर खींचती हैं। कहीं सिनेमा हो रहा है, तो कहीं सरकस। कहीं यमपुरी नाटक है, तो कहीं बंगाल का जादू! राज्य के कोने-कोने से विशेष रेलगाड़ियों और बसों पर आदमा लदे आ रहे हैं और लगता है कि सारा राज्य यहीं सिमट जायगा। मेले में जिधर देखिये, उधर रंगीनी-ही-रंगीनी नजर आती है। लोग धक्के-पर-धक्के दिये जा रहे हैं. धक्के-पर-धक्के खाया रहे हैं! पाकिटमारों की बन आती है। यदि आदमी सावधान न रहे, तो क्षण में ही जेब कट जाया
सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हैं। मेले को 'हरिहर क्षेत्र मेला' के नाम से भी जाना जाता है जबकि स्थानीय लोग इसे छत्तर मेला पुकारते हैं। बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से ३ किलोमीटर दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने के बाकी मेलों के उलट यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। सोनपुर पशु मेला में आज भी नौटंकी और नाच देखने के लिए भीड़ उमड़ती है। एक जमाने में यह मेला जंगी हाथियों का सबसे बड़ा केंद्र था। मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य (340 ई॰पु॰ -298 ई॰पु), मुगल सम्राट अकबर और 1857 के गदर के नायक वीर कुँवर सिंह ने भी से यहां हाथियों की खरीद की थी। सन् 1803 में रॉबर्ट क्लाइव ने सोनपुर में घोड़े के बड़ा अस्तबल भी बनवाया था। एक दौर में सोनपुर मेले में नौटंकी की मल्लिका गुलाब बाई का जलवा होता था।
सोनपुर मेला में भू-राजस्व विभाग का स्टॉल से बिहार के सभी राजस्व ग्रामों का डिजिटल मानचित्र 150 रूपये मात्र सरकारी शुल्क के द्वारा कोई भी नागरिक तीन मिनट के अन्दर प्राप्त कर सकते हैं। यह कार्य राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र पटना के तकनीकी सहयोग के द्वारा किया गया है। समय के बदलते प्रभाव के असर से हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला, पशु बाजारों से हटकर अब आटो एक्स्पो मेले का रूप लेता जा रहा है। पिछले कई वर्षों से इस मेले में कई कंपनियों के शोरूम तथा बिक्री केंद्र यहां खुल रहे हैं। मेले में रेल ग्राम प्रदर्शनी लगी।रेलग्राम में टॉय ट्रेन चलाई जा रही।[18] सोनपुर मेले के प्रति विदेशी पर्यटकों में भी खास आकर्षण देखा जाता है। जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस एवं अन्य विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए स्विस कॉटेजों का निर्माण किया जाता है। पर्यटकों को पटना एयरपोर्ट से सोनपुर मेला आने व जाने के लिए प्रीपेड टैक्सी भी उपलब्ध कराई जायेगी।
सोनपुर के संबंध में पौराणिक कथाएं भी हैं भगवान विष्णु के दो भक्त थे जय और विजय वह किसी श्राप के कारण धरती पर गज यानी कि हाथी और मगरमच्छ यानी कि ग्राह के रूप में जन्म लिए थे
एक बार हाथी जब नदी में पानी पीने गया तो ग्राह ने उसे पकड़ लिया बहुत मेहनत करने के बाद भी जब हाथी ग्राह से अपने आप को नहीं छुड़ा पाया
तब भगवान विष्णु का आवाहन किया यह संग्राम कोनहारा घाट पर हुआ था. जब हाथी कमजोर पड़ने लगा तब भगवान विष्णु ने अपने भक्त का पुकार सुनकर सुदर्शन चक्र चलाकर उस युद्ध का अंत किया था और यह दिन कार्तिक पूर्णिमा का दिन था.
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