जल संकट और जल प्रबंधन। (Water-Harvesting Mechanisms)—Hindi

Опубликовано: 03 Ноябрь 2022
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जल, मानव अस्तित्व को बनाए रखने के लिये एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। यह न केवल ग्रामीण और शहरी समुदायों की स्वच्छता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है बल्कि कृषि के सभी रूपों और अधिकांश औद्योगिक उत्पादन प्रक्रियाओं के लिये भी आवश्यक है। परंतु विशेषज्ञों ने सदैव ही जल को उन प्रमुख संसाधनों में शामिल किया है जिन्हें भविष्य में प्रबंधित करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारत एक गंभीर जल संकट के कगार पर है। मौजूदा जल संसाधन संकट में हैं, देश की नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, जल संचयन तंत्र (Water-Harvesting Mechanisms) बिगड़ रहे हैं और भूजल स्तर लगातार घट रहा है। इन सभी के बावजूद जल संकट और उसके प्रबंधन का विषय भारत में आम जनता की चर्चाओं में स्थान नहीं पा सका है।

देश में जल की कुल खपत का तकरीबन 85 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में प्रयोग किया जाता है।

जबकि केवल 10 प्रतिशत उद्योगों में और केवल 5 प्रतिशत पानी घरों में प्रयोग होता है।

वाटरशेड प्रबंधन योजनाओं द्वारा ही भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश की जनता के लिए भविष्य की भोजन की मांग को पूरा किया जा सकेगा। यह कार्यक्रम मनुष्य को जल के कारण उत्पन्न खतरों, रोग और दोषपूर्ण जल पीने के दुष्प्रभाव से बचाता है। वाटरशेड कार्यक्रम द्वारा हरियाली और वन-क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है, जो भविष्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी आवश्यक है।

जल का जीवन से गहरा संबंध है। पृथ्वी पर उपलब्ध जल का जितना प्रयोग हो रहा है, उससे अधिक जल प्रदूषित हो रहा है और व्यर्थ बहकर बर्बाद हो रहा है। इसलिए आज जल प्रबंधन की महती आवश्यकता है।

भारत में जल-संसाधनों के प्रबंध हेतु निम्न प्रयास किए जा रहे हैं-


1. जल-संसाधन प्रबंधन एवं प्रशिक्षण योजना- सन् 1984 में भारत सरकार केंद्रीय जल आयोग ने सिंचाई अनुसंधान एवं प्रबंध-संगठन की स्थापना की। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य सिंचाई प्रणालियों को सुधारना था। सिंचाई संस्थाओं को कुशल बनाना तथा अनुरक्षण करना इसका उद्देश्य था।

2. राष्ट्रीय जल-प्रबंध परियोजना- भारत सरकार ने सन् 1986 में विश्व बैंक की सहायता से राष्ट्रीय जल-प्रबंध परियोजना प्रारंभ की है। इस परियोजना को भारत के कृषि-क्षेत्र को विकसित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया।

3. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण- केंद्रीय जल आयोग ने राज्यों के प्रतिनिधियों को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का कार्यक्रम प्रारंभ किया। इसके अंतर्गत राज्यों से आए प्रतिनिधियों को कार्यशाला के आयोजन, सेमिनार, श्रम इंजीनियर के आदान-प्रदान इत्यादि कार्यक्रमों द्वारा भारत के विभिन्न राज्यों में प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण किया जाता है।

4. अधोभौमिक जल संसाधनों के लिए योजना- केंद्रीय जल आयोग ने भारत के उन क्षेत्रों में जहां अधोभौमिक जल के उपयोग के क्षेत्र में अधिक कार्य नहीं हुआ, जैसे भारत का पूर्वी क्षेत्र, वहां नलकूप निर्माण और उन्हें क्रियाशील बनाने के लिए केंद्रीय योजना तैयार की है।

5. नवीन जल-नीति- भारत सरकार ने 31 मार्च, 2002 से नवीन जल-नीति लागू की। इसके अंतर्गत जल-संरक्षण को एक मुख्य विषय के रूप में अगली पंचवर्षीय योजना में सम्मिलित किया गया।

जल संरक्षण एवं प्रबंधन की प्रणालियां

1. जिन क्षेत्रों में ढाल अधिक नहीं है, उन क्षेत्रों में (मंटुआर बंध) पुश्ते लगाए जा सकते हैं, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र में किसान आपसी सहयोग से जो ऊपर, वह पुश्ता लगा ले तो उनके खेत में जब पानी भर जाएगा तो अतिरिक्त पानी नीचे के खेत में जाकर भरने लगेगा।

2. भूमिगत बांधों का निर्माण किया जाए, जिससे गैर-मानसून महीनों मे भूमिगत (नाली के जल को नदी के चैनलों में जाने से रोका जाए, इससे नदी का जल प्रदूषित होने से रोका जा सकेगा।

3. छोटे और बड़े पोखर और तालाबों का निर्माण किया जाए, जो 10 मीटर तक गहरे हों। जहां वर्षा कम होती है, उन क्षेत्रों में ऐसे आधे हेक्टेयर क्षेत्रफल के तालाबों में जल ग्रहण की क्षमता 50 हेक्टेयर तक होनी चाहिए।

4. जो क्षेत्र दूर-दूर तक फैले हैं, उन क्षेत्रों में विशेष प्रकार के तालाब बनाए जा सकते हैं, जिनमें पानी का रिसाव होता है, इन्हें सतही परिस्रवण ताल कहते हैं।

5. यदि क्षेत्र के कुएं का जलस्तर घट रहा है तो पंप की सहायता से नदी का पानी कुओं में भर दिया जाए।

6. जहां बड़ी नदियां हैं और प्रतिवर्ष बाढ़ आती है, ऐसे क्षेत्रों में नदियों की बाढ़ को उन क्षेत्रों में मोड़ देना चाहिए, जिन क्षेत्रों में कुएं और तालाब हों।

7. देश के कृषकों को यह बात समझाई जाए कि जो वर्षा का जल खेतों में भर जाता है, उन्हें खेतों से बाहर बहकर जाने से रोकने का उपाय वे स्वयं करें।

8. गांव अथवा नगर की नालियों को नदी के संपर्क से दूर रखने के लिए लोगों को जागरूक करने की योजना अमल में लाई जाए।

वर्षाजल का संरक्षण

भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण देश के अनेक क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में पेयजल संकट उत्पन्न हो जाता है। प्रतिवर्ष भूमि पर गिरने वाले वर्षाजल में से 4000 घन कि.मी. अर्थात् दो-तिहाई भाग व्यर्थ बह जाता है। इसे रोकने के लिए ऊपरी छत से वर्षाजल के संरक्षण की योजना बनाई गई है।

जलभारण या वाटरशेड भूमि पर एक जल निकास क्षेत्र है, जो वर्षा के बाद बहने वाले जल को किसी नदी, झील, बड़ी धारा अथवा समुद्र में मिलाता है। यह किसी भी आकार का हो सकता है। इस उपाय के अंतर्गत कृषि भूमि के लिए ही नहीं, अपितु भूमि जल-संरक्षण, अनुपजाऊ एवं बेकार भूमि का विकास, वनरोपण और वर्षाकाल के जल का संचयन कार्य किया जा सकता है।

वाटरशेड प्रबंधन योजनाओं द्वारा ही भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश की जनता के लिए भविष्य की भोजन की मांग को पूरा किया जा सकेगा। यह कार्यक्रम मनुष्य को जल के कारण उत्पन्न खतरों, रोग और दोषपूर्ण जल पीने के दुष्प्रभाव से बचाता है। वाटरशेड कार्यक्रम द्वारा हरियाली और वन-क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है, जो भविष्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी आवश्यक है।


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